मृत्यू_का_अनुभव सपनो की दुनिया का सच....
मृत्यू_का_अनुभव सपनो की दुनिया का सच....
सोने से पुर्व जिस प्रकार स्वप्न की छाया पडने लगती है ।
उसी प्रकार मृत्यू के छः माह पुर्व उसकी छाया पडने लगती है ।
उस समय जागरूक व्यक्ति मृत्यू की भविष्यवाणी कर सकता है ।
पांच छः घण्टे या एक-दो-दिन पुर्व तो स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगते है । जिसमे कई व्यक्ति अपनी मृत्यू की पुर्व सुचना दे देते है ।
जो नित्य सोते या उठते समय प्रार्थना का प्रयोग करते या ध्यान करते है
उन्हें अपनी मृत्यु के समय का पता चल जाता है ।
मृत्यु के समय मनुष्य को विशेष अनुभूति होती है जिससे वह घबरा जाता है ।
व बेहोश हो जाता है उसके प्राण बेहोशी मे निकलते है।
जिससे उसको पता ही नही चलता कि मै मर गया हुँ मेरा शरीर मुझ से अलग हो गया है ।
अब मैअशरीरी जीवात्मा मात्र हुँ। जो भयभीत नही होता उसे अपने प्राण निकलने का बराबर ध्यान रहता है
यह जीवन भर की गई साधना व धैर्य के कारण ही सम्भव है ।अन्यथा नही
जवानी में या दुर्घटना से मरने पर उसे अपनी मृत्यु का अनुभव नही होता क्याकि अनुभव करने वाले यन्त्र पहले ही मर चुके होते है ।
मरे हुए व्यक्ति की स्मृति तीन दिन रहती है फिर वह भूल जाता है कुछ की तेरह दिन रहती है ।।
आत्मा के निकलने पर भी शरीर की उर्जा तीन दिन तक उसमे से निकलती रहती है जैसे वृक्ष के काटने पर भी उसे सुखने मे कई दिन लग जाते है ।
ह्रदय की धडकन बन्द होने पर भी लोग मनुष्य को ,मृत घोषित कर देते है ।
जिससे शारीरिक मृत्यु कहा जाता है किन्तु जब शरीर की सम्पुर्ण उर्जा बाहर निकल जाती है तो उसे जैविक मृत्यु कहा जाता है ।
इसमे तीन दिन लग जाते है जैविक मृत्यु से पुर्व यदि विशेष विधियों के द्वारा आत्मा का शरीर मे पुनः प्रवेश कराया जा सके तो वह पुनः जीवित हो सकता है ।
जैसे पौधा जमीन से उखाड़ देने पर पर भी थोडे समय बाद ही पुनः लगाने पर जीवित हो जाता है
कभी कभी ऐसा भ होता है कि जीवात्मा शरीर को छोड़ देती है किन्तु शरीर बेकार नही हुआ है तो अन्य आत्मा उसमे प्रवेश कर जाती है ।
गुण और कर्म के अनुसार ही मनुष्य का जन्म होता है इसलिये मनुष्य की जाति जन्म से ही मानी जाती है भोजन विवाह आदि लौकिक व्यवहार मे तो जाति प्रधानता है पर परमात्माप्रप्ति मे भाव और विवेक की प्रधानता है
जाति या वर्ण की नही जैस सब के सब बालक मॉं की गोद मे जाने के समान अधिकारी है
ऐसे ही भगवान का अंश होने के सब के सब जीव भगवत्प्राप्ति के समान अधिकारी है
सब के सब मनुष्य परमात्मा तत्त्व को मुक्ति को तत्त्व ज्ञान को भक्तप्रेम को भगवदर्शन को प्राप्त करने मे स्वतंत्र स्मर्थ योग्य और अधिकारी है
विदुर निषादराज गुह कबीर रैदास सदन कसाई आदि अनेक निम्न जाति के मनुष्य भगवान की भक्ति के कारण ही श्रेष्ठ बने है
जाति व वर्ण के कारण नही अतःब्रह्मण का शरीर हो चाहे शुद्र का शरीर हो लोक व्यवहार मे तो उनमे भेद रहेगा
पर भगवत्प्राप्ति मे कोई भेद नही रहेगा
जिससे वह मृत शरीर पुनः जी उठता है
