भारत के शास्त्रीय नृत्य और उनके राज्य....

 भारत के शास्त्रीय नृत्य और उनके राज्य....




1. भरतनाट्यम : तमिलनाडु

2. कत्थक : उत्तरप्रदेश

3. कत्थककली : केरल

4. कुचिपुड़ी : आंध्रप्रदेश प्रदेश

5. मणिपुरी : मणिपुर

6. ओडिसी :उड़ीसा

7. सत्त्रिया : असम

8. मोहिनीअट्टम : केरल


भारतनाट्यम :


भरतनाट्यम भारतीय शास्त्रीय नृत्य का एक बहुत बृहत् रूप है. इसका उद्भव और विकास तमिलनाडु और उसके आस- पास के मंदिरों से हुआ है. मुख्यतः परंपरा के अनुसार भरतनाट्यम एक “एकक” नृत्य फॉर्म है, जिसका प्रदर्शन मुख्यतः एक स्त्री करती है. इसका विषय हिन्दू परम्पराएँ होती हैं, जिसमे वैष्णव, शैव, शक्ति आदि का प्रभाव देखने मिलता है. इसकी सैद्धांतिक बुनियाद नाट्य शास्त्र में प्राचीन संस्कृति में संकलित है.


भारतनाट्यम अपनी विशेष मुद्राओं के लिए मशहूर है. स्थाई ऊपरी धड़ और स्थिर घुटनों के साथ मुड़े पैर इसकी मुद्रा को एक ख़ास रूप देते हैं. इसकी ख़ास इंगित भाषा का व्याकरण इसे एक अलग रूप देती है. इस नृत्य का प्रदर्शन प्रायः संगीत और गायक के साथ होता है, प्रदर्शन के समय नर्तक अथवा नर्तकी के गुरु निर्देशक के तौर पर वहाँ मौजूद रहते हैं.


उन्नीसवीं सदी तक भरतनाट्य भारतीय मंदिरों में होता रहा, और फिर 1910 ईस्वी के आस- पास ब्रिटिश सरकार ने इसे बैन करा दिया. भारतीय लोगों ने इस बैन का विरोध किया और 20 वीं सदी में मंदिरों के बाहर करने लगे. आधुनिक भरतनाट्यम निगमित विशुद्ध नृत्य है, जिसका विषय किसी धर्म विशेष पर आधरित नहीं होता.


कत्थक :


कत्थक शब्द की उत्पति संस्कृत के “कथा” से हुई है. संस्कृत में कथा कहने वाले को “कत्थक” कहा जाता है. कत्थक की उत्पति भक्ति आन्दोलन के समय हुई. उस समय इसमें भगवन श्री कृष्ण के बचपन की तथा अन्य कहानियों को दिखाया जाता है. इसके अतिरिक्त अन्य कहानियों की भी प्रस्तुति नृत्य के माध्यम से होती है. धीरे धीरे इसका विकास हुआ और 16 वीं सदी के आस पास मुग़ल बादशाहों के दरबार में ये फ़ारसी भाषा के साथ पेश किया जाने लगा.


कत्थक तीन अलग अलग फॉर्म में पाया जाता है. ये तीन अलग अलग फॉर्म तीन अलग-अलग जगहों में किय जाने की वजह से है. ये तीन शहर हैं बनारस, जयपुर और लखनऊ. इस नृत्य में मुख्यतः विशेषता इसकी पैरों का मूवमेंट हैं.


कत्थकली :


केरल में सत्रहवीं सदी के आसपास इस अभिनय- नृत्य का उद्भव और विकास देखने मिलता है. कत्थक यानि कथा और कलि यानि प्रदर्शन, “कत्थकली” भी कत्थक की ही तरह विशेष तरह से कहानियों को कहने का आर्ट फॉर्म है. इसमें नर्तक या नर्तकी को बहुत ही विशेष तरह की सज्जा दी जाती है. बहुत रंगीन मेक- अप और विशेष तरह के पोशाक में प्रायः पुरुष इस नृत्य को पेश करते नज़र आते हैं.


प्राथमिक तौर पर कथकली हिन्दू धर्म की विशेषताओं को लिए जन्मी थी, जो हिन्दू मिथकों के महान व्यक्तित्वों की कहानियाँ कहती थी. आधुनिक समय में इसके प्रदर्शन के समय अभिनय और नृत्य के साथ साथ एक गायक भी होता है, जो प्राचीन समय में नहीं रहने से अभिनेता और नर्तक को ही गायन भी करना पड़ता था.


कुचिपुड़ी :


कुचिपुड़ी शास्त्रीय नृत्य का जन्म आधुनिक भारत के आन्ध्रप्रदेश के कृष्णा ज़िले में हुआ. अन्य बड़े शास्त्रीय नृत्य कलाओं की तरह ही ये भी धार्मिक विश्वास को लिए पनपा है. पारंपरिक कुचिपुड़ी में सारे कलाकार पुरुष ही होते थे. ये पुरुष मुख्यतः ब्राम्हण होते थे. ये पुरुष ही प्रदर्शन के समय स्त्री का रूप लेते थे. बहुत अच्छे पोशाक और सज्जा के साथ इसे किया जाता रहा.


आधुनिक कुचिपुड़ी में ऐसी धारणा है कि तीर्थ नारायण यति और उनके शिष्य सिद्धेन्द्र योगी ने बहुत ही व्यवस्थित तरह से इसे सत्रहवीं सदी के आस पास विकसित किया. ये नृत्य विशेषतः भगवान विष्णु या श्री कृष्णा पर आधारित “वैष्णव” परंपरा को लिए होता है. ये तमिलनाडु में होने वाले “भगवत मेला” से बहुत मिलता- जुलता हुआ प्रतीत होता है.


ओड़िसी :


ओड़िसी का उद्भव भारत के उड़ीसा राज्य में हुआ. शास्त्रीय नृत्य का ये रूप मुख्यतः स्त्रियों द्वारा किया जाता रहा. इस फॉर्म में भी धार्मिक विश्वासों को आधार बनाकर नृत्य किया जाता था. भगवान विष्णु के जगन्नाथ रूप की कथाओं और मिथकों को इस नृत्य में खूब अपनाया गया. इसके अतिरिक्त यह भगवान शिव और सूर्य की कथाओं के आधार पर भी खूब किया गया.


ओड़िसी मुख्यतः एक ऐसा “डांस- ड्रामा” है जिसमे सांकेतिक पोशाकों को पहन कर हिन्दू विश्वासों पर आधारित कविताओं पर या कथाओं के आधार पर कलाकार विशेष मुद्राओं के साथ नृत्य प्रस्तुत करता हैं.


सत्त्रिया :


पंद्रहवीं सदी के आस- पास असम में रह रहे वैष्णवों के बीच इस नृत्य कला का जन्म हुआ. ये मुख्यतः भगवान कृष्णा की लीलाओं पर आधारित था. पंद्रहवीं सदी के आस पास भक्ति काल के संत श्रीमंत शंकरदेव ने इसे भक्ति आन्दोलन से जोड़ा. इस नृत्य कला को यदि एक अंक में प्रस्तुत किया जाए तो उसे “अंकीय नट” कहा जाता है. ये मुख्यतः कृष्णा- राधा के सम्बन्धों की कथाओं पर या कभी कभी राम- सीता के कथाओं पर आधारित होता है.


मणिपुरी :


भारत और म्यांमार (वर्मा) के बॉर्डर पर स्थित मणिपुर में इसका उद्धव और विकास हुआ. मणिपुर में उद्भव होने की वजह से इसे मणिपुरी कहा जाता है. ये मुख्यतः अपने वैष्णव थीम और राधा-कृष्ण की प्रेमलीला “रासलीला” के लिए जाना जाता है. इसके अतिरिक्त ये शिव, शक्ति आदि पर आधारित कथाओं पर भी होता है. इसका प्रदर्शन एक पूरा नृत्य दल मिल के करता है, जिसमे सभी एक विशेष क़िस्म के पोशाक “कुमिल” पहने हुए होते हैं. इसमें नर्तकों की मुद्राएँ विशेषतः उसके हाथ और शरीर के ऊपरी भागों पर आधारित होती है.


मोहिनीअट्टम :


मोहिनीअट्टम भगवन विष्णु के “मोहिनी” अवतार पर आधारित है, जिस वजह से इसे “मोहिनीअट्टम” कहा गया है. इसका उद्भव और विकास केरल में हुआ. “मोहिनी” भगवान् विष्णु का वह अवतार है, जिसकी सहायता से भगवान विष्णु ने एक सुर- असुर के बीच के युद्ध में देवताओं की मदद की थी, और असुरों को भ्रमित किया. इस नृत्य फॉर्म में “लस्य” शैली का प्रयोग किया जाता है, जिसका वर्णन नाट्य-शाश्त्र में मिलता है. “लस्य” शैली में बहुत ही कोमल भावों को विभिन्न मुद्राओं से दर्शाया जाता है. ये मुख्यतः एक “एकल” नृत्य फॉर्म है, जिसे सीखने के लिए महिलाओं को खूब मेहनत करनी पड़ती है. इसमें इस्तेमाल होने वाले गीत मुख्यतः “मणिपर्व” नाम के एक भाषा में होते है, जो संस्कृत और मलयालम से मिल कर बनी है.